झांसी: सरकारी योजनाओं में बजट खर्च होने के बाद उनकी निगरानी और रखरखाव किस तरह नजरअंदाज हो जाता है, इसका एक उदाहरण झांसी के सिमरधा बांध से लगी जमीन पर देखने को मिल रहा है. यहां करीब 5 हेक्टेयर क्षेत्र में वन विभाग ने लाखों रुपये खर्च कर तार फेंसिंग कराई और पौधरोपण कराया था. इस अभियान के तहत उत्तर प्रदेश की राज्यपाल ने भी कई महत्वपूर्ण प्रजातियों के पौधे लगाए थे. लेकिन कुछ समय बाद ही पौधों की हालत और फेंसिंग की स्थिति ने पूरे प्रोजेक्ट की निगरानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
राज्यपाल के हाथों लगे पौधे भी नहीं बच सके
इस जमीन पर आंवला, बहेड़ा, सहजन, हरड़, नीम, जामुन, अर्जुन, बरगद, पीपल और पाखर जैसी प्रजातियों के पौधे लगाए गए थे. उद्देश्य था कि क्षेत्र को हरित क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाए और लगाए गए पौधों को संरक्षित कर उन्हें बड़े पेड़ों में बदला जाए. लेकिन मौजूदा स्थिति में बड़ी संख्या में पौधे सूखे नजर आ रहे हैं. स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के मुताबिक पौधों को पर्याप्त पानी नहीं मिल सका, जिसके चलते उनका संरक्षण नहीं हो पाया. जिस स्थान पर विकसित हरित क्षेत्र दिखाई देना चाहिए था, वहां अब जंगली वनस्पतियां और झाड़ियां अधिक नजर आ रही हैं.
फेंसिंग पर खर्च हुआ पैसा, फिर सुरक्षा कहां गई?
पौधों की सुरक्षा के लिए वन विभाग ने पूरे क्षेत्र में तार फेंसिंग कराई थी. इसके लिए बड़ी संख्या में खंभे और तार लगाए गए थे. लेकिन अब फेंसिंग भी बदहाल हो चुकी है. कई स्थानों पर तार गायब हैं, जबकि कुछ जगहों पर फेंसिंग के खंभे भी दिखाई नहीं देते. सवाल यह है कि जब पौधों को बचाने के लिए सरकारी धन से सुरक्षा व्यवस्था तैयार की गई थी, तो उसकी नियमित निगरानी किस स्तर पर हुई?
पौधरोपण हुआ, लेकिन पौधों को पानी कौन देगा?
पौधरोपण के दौरान पौधे लगाना तस्वीर और कार्यक्रम का हिस्सा हो सकता है, लेकिन पौधे लगाने के बाद उनकी देखभाल ही असली परीक्षा होती है. सिमरधा बांध से लगी इस जमीन पर यही सवाल सबसे बड़ा बनकर सामने आता है. सरकारी धन से जमीन तैयार हुई, फेंसिंग कराई गई और महत्वपूर्ण प्रजातियों के पौधे लगाए गए. राज्यपाल तक ने यहां पौधरोपण किया. इसके बावजूद यदि पौधों को पानी और संरक्षण नहीं मिल पाया, तो सवाल केवल सूखे पौधों का नहीं है, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का है जो पौधरोपण के बाद गायब हो गई.
लाखों के खर्च का हिसाब कौन देगा?
मामला सिर्फ कुछ पौधों के सूखने तक सीमित नहीं है. सवाल उस सरकारी धन का भी है जो जमीन की फेंसिंग, पौधरोपण और संरक्षण व्यवस्था पर खर्च किया गया. अगर फेंसिंग टूटकर गायब हो गई और लगाए गए अधिकांश पौधे जीवित नहीं बच सके, तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इस परियोजना की निगरानी कितनी बार की गई, पौधों की सिंचाई की क्या व्यवस्था थी और फेंसिंग की सुरक्षा के लिए जिम्मेदारी किस अधिकारी या कर्मचारी की थी.
कागज पर हरियाली या जमीन पर नतीजा?
पौधरोपण अभियानों में अक्सर पौधों की संख्या और कार्यक्रम की तस्वीरें सामने आती हैं, लेकिन किसी भी अभियान की वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि कुछ साल बाद वहां कितने पौधे जीवित हैं. सिमरधा बांध के पास करीब 5 हेक्टेयर जमीन पर मौजूदा स्थिति इसी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करती है. यदि सरकारी खर्च के बाद भी पौधे सूख जाएं और सुरक्षा के लिए लगाई गई फेंसिंग तक गायब हो जाए, तो विभाग की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था की जवाबदेही तय होना जरूरी है. अब सवाल वन विभाग से है – जिस प्रोजेक्ट पर लाखों रुपये खर्च किए गए, उसका नतीजा जमीन पर कहां है? पौधों की देखभाल के लिए जिम्मेदार कौन था और फेंसिंग से गायब तार-खंभों का हिसाब कौन देगा?
झांसी में लाखों की फेंसिंग, राज्यपाल के लगाए पौधे सूखे; सिमरधा बांध के पास सरकारी प्रोजेक्ट की खुली पोल
