झांसी: जिस प्लास्टिक को आमतौर पर कचरे के ढेर, नालियों और लैंडफिल की समस्या माना जाता है, उसी प्लास्टिक को अब सड़क निर्माण की सामग्री के रूप में इस्तेमाल करने का प्रयोग झांसी में किया गया है। झांसी-ललितपुर हाईवे पर NHAI की परियोजना कार्यान्वयन इकाई (PIU) झांसी ने करीब एक किलोमीटर लंबे दो-लेन हिस्से पर वेस्ट प्लास्टिक मॉडिफाइड बिटुमिन का पायलट ट्रायल किया है।
इस प्रयोग में करीब 1,350 किलोग्राम यानी 1.35 टन वेस्ट LDPE का इस्तेमाल किया गया। प्लास्टिक मुख्य रूप से खराब हो चुके सिंचाई पाइप और वेस्ट फाइल-फोल्डर से प्राप्त किया गया था। इसे सीधे सड़क पर नहीं डाला गया, बल्कि प्रोसेस करके एक समान पेलेटाइज्ड रूप में तैयार किया गया और निर्धारित मात्रा में बिटुमेन के साथ नियंत्रित तरीके से मिलाया गया।
1 किलोमीटर सड़क में 1.35 टन प्लास्टिक का इस्तेमाल
आंकड़ों को आसान भाषा में समझें तो इस पायलट में:
– वेस्ट प्लास्टिक: करीब 1,350 किलोग्राम
– कुल मात्रा: करीब 1.35 टन
– सड़क की लंबाई: करीब 1 किलोमीटर
– सड़क: दो-लेन बिटुमिनस कंक्रीट का हिस्सा
– प्लास्टिक का औसत इस्तेमाल: करीब 1.35 किलोग्राम प्रति सड़क मीटर, यदि पूरे एक किलोमीटर के ट्रायल पर मात्रा को औसत माना जाए।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर किलोमीटर सड़क में हमेशा 1.35 टन प्लास्टिक ही लगेगा। वास्तविक मात्रा सड़क की डिजाइन, मिश्रण और तकनीकी विनिर्देश पर निर्भर करेगी।
पर्यावरण के लिए इसका क्या मतलब?
प्लास्टिक का सबसे बड़ा पर्यावरणीय संकट यह है कि इसका निस्तारण आसान नहीं होता। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 2022-23 की वार्षिक रिपोर्ट में 2021-22 के लिए देश में अनुमानित प्लास्टिक कचरा उत्पादन 39.02 लाख टन प्रति वर्ष बताया गया है। इसी रिपोर्ट के अनुसार उस समय उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर रीसाइक्लिंग क्षमता करीब 9.35 लाख टन प्रति वर्ष दर्ज की गई थी। ऐसे में सड़क निर्माण जैसी बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर गतिविधि में उपयुक्त प्लास्टिक कचरे का नियंत्रित इस्तेमाल होने पर इसका एक हिस्सा लैंडफिल या अन्य निस्तारण प्रणालियों पर जाने के बजाय उपयोगी निर्माण सामग्री में बदला जा सकता है।
इस प्रयोग में अकेले 1.35 टन प्लास्टिक को सड़क निर्माण में उपयोग के लिए डायवर्ट किया गया है। अगर इस तरह की तकनीक बड़े पैमाने पर तकनीकी परीक्षणों के बाद अपनाई जाती है, तो प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन के लिए एक अतिरिक्त उपयोग का रास्ता बन सकता है। हालांकि इसे प्लास्टिक समस्या का अकेला समाधान नहीं माना जा सकता। कचरे का स्रोत पर पृथक्करण, रीसाइक्लिंग और वैज्ञानिक निस्तारण भी जरूरी रहेगा।
आम आदमी को इससे क्या फायदा हो सकता है?
इस प्रयोग का असर सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं है। अगर वास्तविक यातायात और मौसम में सड़क का प्रदर्शन लैब परीक्षणों के अनुरूप रहता है, तो इसके संभावित फायदे आम लोगों तक पहुंच सकते हैं। सबसे बड़ा सवाल सड़क की टिकाऊपन और रखरखाव का है। प्रयोगशाला परीक्षणों में LDPE मिश्रित बिटुमेन में नमी से होने वाले नुकसान और अधिक तापमान में सड़क पर बनने वाले रटिंग के प्रति बेहतर प्रतिरोध देखा गया है। रटिंग यानी भारी यातायात और गर्मी के कारण सड़क की सतह पर बनने वाले लंबे दबावयुक्त निशान।
बुंदेलखंड जैसे गर्म और अपेक्षाकृत शुष्क क्षेत्र में सड़क का उच्च तापमान के दौरान प्रदर्शन महत्वपूर्ण है। यदि फील्ड मॉनिटरिंग में तकनीक बेहतर साबित होती है, तो भविष्य में सड़क के रखरखाव, मरम्मत और यातायात सुविधा पर इसका असर देखा जा सकता है। अभी इस संबंध में निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
बारिश और गर्मी में सड़क की असली परीक्षा
सड़क की गुणवत्ता का फैसला सिर्फ सड़क बिछाने के तुरंत बाद नहीं किया जा सकता। वास्तविक परीक्षा तब होगी जब इस हिस्से पर लगातार भारी वाहन चलेंगे और सड़क को बारिश, गर्मी तथा तापमान के उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ेगा। NHAI के अनुसार इस पायलट हिस्से की वास्तविक यातायात और पर्यावरणीय परिस्थितियों में निगरानी की जाएगी। इससे सड़क की मजबूती, टिकाऊपन और लंबे समय के प्रदर्शन का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा। यानी अभी इसे एक सफल पायलट ट्रायल कहना उचित है, लेकिन इसे लंबे समय में सामान्य सड़क निर्माण से बेहतर साबित करने के लिए फील्ड डेटा का इंतजार करना होगा।
सामान्य प्लास्टिक नहीं, चुना हुआ LDPE
इस प्रयोग की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि सड़क में किसी भी तरह का मिश्रित या गंदा प्लास्टिक कचरा नहीं डाला गया। इस्तेमाल किए गए प्लास्टिक में खराब सिंचाई पाइप तथा वेस्ट फाइल और फोल्डर से प्राप्त LDPE शामिल था। स्थानीय रिसाइक्लर्स और MSME की मदद से प्लास्टिक को प्रोसेस करके एक समान पेलेटाइज्ड रूप दिया गया। इसके बाद मशीनों के माध्यम से निर्धारित मात्रा में इसे बिटुमेन के साथ मिलाया गया। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि भविष्य में ऐसी तकनीक का इस्तेमाल केवल छांटे गए, प्रोसेस्ड और निर्धारित गुणवत्ता वाले प्लास्टिक के साथ ही प्रभावी और नियंत्रित तरीके से किया जा सकता है।
IIT-BHU की तकनीक पर सड़क निर्माण का परीक्षण
इस तकनीक को IIT-BHU वाराणसी के प्रोफेसर डॉ. अंकित गुप्ता के पर्यवेक्षण में MoRTH द्वारा प्रायोजित शोध परियोजना के तहत विकसित किया गया है। IIT-BHU के आधिकारिक प्रोफाइल में डॉ. अंकित गुप्ता को सिविल इंजीनियरिंग विभाग का प्रोफेसर और MoRTH Chair Professor बताया गया है तथा उनके शोध क्षेत्रों में pavement materials और recycling शामिल हैं। IT-BHU के रिकॉर्ड में LDPE-modified binders और waste-derived LDPE के asphalt modification पर 2026 के शोध कार्य भी दर्ज हैं। उनके नाम से सड़क निर्माण के लिए bituminous product से संबंधित भारतीय पेटेंट भी दर्ज है।
सरकार की नीति में भी प्लास्टिक का सड़क निर्माण में इस्तेमाल
यह प्रयोग किसी पूरी तरह नई अवधारणा से अलग नहीं है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण और रखरखाव में बिटुमिनस कंक्रीट के wearing course में waste plastic के इस्तेमाल से संबंधित दिशानिर्देश जारी किए हैं। MoRTH की 26 नवंबर 2024 की गाइडलाइन में भी इस विषय को दर्ज किया गया है। इससे संकेत मिलता है कि सड़क निर्माण में उपयुक्त प्लास्टिक कचरे के नियंत्रित उपयोग को तकनीकी और नीतिगत स्तर पर पहले से परखा जा रहा है।
झांसी का प्रयोग क्यों महत्वपूर्ण है?
झांसी-ललितपुर हाईवे पर हुआ यह प्रयोग तीन अलग-अलग समस्याओं को एक साथ जोड़ता है—प्लास्टिक कचरा, सड़क की गुणवत्ता और संसाधनों का पुन: उपयोग। अभी इस एक किलोमीटर सड़क से पर्यावरण पर पड़ने वाले कुल प्रभाव को किसी निश्चित संख्या में बताना संभव नहीं है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस ट्रायल में 1.35 टन चयनित प्लास्टिक कचरे को सड़क निर्माण में उपयोग किया गया, जबकि प्रयोगशाला परीक्षणों में मिश्रित बिटुमेन के कुछ प्रदर्शन मानकों में सुधार देखा गया है।
अब सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा आने वाले समय का होगा—सड़क ने वास्तविक ट्रैफिक, बारिश और गर्मी में कैसा प्रदर्शन किया? अगर फील्ड मॉनिटरिंग में तकनीक टिकाऊ साबित होती है, तो झांसी का यह एक किलोमीटर का प्रयोग केवल सड़क निर्माण का ट्रायल नहीं रहेगा, बल्कि कचरे को संसाधन में बदलने वाली सर्कुलर इकोनॉमी के एक व्यावहारिक मॉडल के रूप में आगे के परीक्षणों का आधार बन सकता है।

