बुंदेलखंड की की लोकसंस्कृति में गीत, कहानियां, किस्से, नाटक और तमाशे की भी अपनी अलग दुनिया रही है। इन्हीं लोक परंपराओं में एक नाम है- भंड़ैती। भंड़ैती भांड़ कलाकारों की ऐसी लोकनाट्य शैली थी, जिसमें हंसी-मजाक, नकल और व्यंग्य के जरिए समाज की बातें कही जाती थीं। भांड़ लोगों को हंसाता जरूर था, लेकिन उसकी बातों में अक्सर कोई न कोई सीख या तंज छिपा होता था। खुले मैदान या चबूतरे पर खड़े होकर दो-चार भांड़ हँसी-मजाक और चुटीले व्यंग्य से लोगों का मनोरंजन करते थे।
भांड़ कौन होते थे?
भांड़ घूम-घूमकर लोगों का मनोरंजन करने वाले लोक कलाकार होते थे। वे किसी व्यक्ति की चाल-ढाल, बोलने के तरीके या उसके व्यवहार की नकल करके लोगों को हंसाते थे। लेकिन उनका काम सिर्फ हंसाना नहीं था। वे समाज में जो कुछ गलत या अजीब देखते थे, उसे भी मजाक के जरिए सामने रखते थे। किसी लालची आदमी की नकल हो, किसी घमंडी व्यक्ति का मजाक हो या किसी अधिकारी और अमीर की मनमानी-भांड़ अपनी कला के जरिए ऐसी बातों पर चुटकी लेता था। यही भांड़ों की प्रस्तुति आगे चलकर भंड़ैती के रूप में पहचानी गई।
क्या है भंड़ैती?
भंड़ैती भांड़ों का लोकनाट्य है। इसमें कोई खास सेट, कपड़े या मेकअप की जरूरत नहीं पड़ती थी। भांड़ अपनी वाक्पटुता, हाजिरजवाबी और चुटीले हास्य पर निर्भर रहते। एक भांड़ कुछ बोलता, दूसरा उसी बात को पकड़कर आगे बढ़ा देता। कथा छोटी होती, लेकिन उसमें समाज, धर्म, राजनीति और पाखंड पर तीखा व्यंग्य छिपा रहता। कभी गीत गाते, कभी सवाल-जवाब करते। बीच-बीच में स्वाँग भी जोड़ देते। सब कुछ बिना रिहर्सल के, मौके पर ही हो जाता। भंड़ैती की सबसे बड़ी ताकत उसका व्यंग्य था। भांड़ किसी की सीधी आलोचना करने के बजाय उसकी नकल करता था। वह उसकी चाल, आवाज और बोलने के अंदाज को इतना बढ़ा देता कि लोग हंसने लगते। लेकिन हंसी के साथ-साथ लोग यह भी समझ जाते कि कलाकार असल में किस कमजोरी पर चोट कर रहा है। इस तरह भंड़ैती में मनोरंजन भी था और समाज की सच्चाई भी। उस समय जब हर बात सीधे कह पाना आसान नहीं था, तब भांड़ हंसी-मजाक के सहारे बहुत कुछ कह जाता था।
हजारों साल पुरानी परंपरा
ये नाट्य बहुत पुराना है। नाट्यशास्त्र में ‘भाण’ नाम की विधा का जिक्र मिलता है। उसी की लोक शैली भंड़ैती बनी। चंदेल राजा कीर्तिवर्मनदेव (1060-1100 ई.) के समय श्रीकृष्ण मिश्र के नाटक प्रबोध चन्द्रोदय में और परमर्दिदेव (1165-1203 ई.) के काल में वत्सराज के कर्पूरचरित में इसके संकेत मिलते हैं। यानी करीब हजार साल पहले से ये कला मौजूद थी। दिल्ली सल्तनत और मुगल काल में दरबारों में भांड़ हुआ करते थे। बुंदेला राजाओं ने भी मुगलों के रिवाज अपनाए, इसलिए मध्ययुग में बुन्देलखंड में भंड़ैती और फल-फूल गई। तुलसीदास ने दोहावली में लिखा है – “चोर चतुर बटपार नट, प्रभुप्रिय भंडुआ भंड”। केशवदास की रामचन्द्रिका में भी आता है – “कहूँ भांड़ भांड़यो करै मान पावैं। कहूँ लोलिनी बेड़िनी गीत गावैं।” इससे साफ है कि 17वीं सदी के शुरू में भांड़ों को काफी सम्मान मिलता था। हर रियासत में प्रसिद्ध भांड़ों को सुविधाएँ देकर रखा जाता था। होली, दशहरा, शादी-ब्याह या सालगिरह पर जब दरबार या महफिल लगती, तब भंड़ैती जरूर होती। सामंतों और रईसों के घरों में भी इन्हें जगह मिलती थी।
बुंदेली भाषा का अपना रंग
भंड़ैती की असली जान उसकी भाषा थी। भांड़ आम लोगों की भाषा बोलता था। कठिन और किताबी शब्दों के बजाय बुंदेली के मुहावरे, कहावतें और रोजमर्रा के शब्द उसके संवादों में होते थे। इसी वजह से गांव का आदमी उसकी बात तुरंत समझ जाता था और मजा भी लेता था। बुंदेली की अपनी ठेठ बोली और अंदाज भंड़ैती को और मजेदार बनाते थे। कई बार एक छोटा-सा स्थानीय मुहावरा ही पूरी सभा को हंसाने के लिए काफी होता था।
अब क्यों गायब हो रही है?
दतिया के नत्थू और झांसी के बब्बू जैसे भांड़ों की चर्चा आज भी पुराने लोग करते हैं। रियासतों के खत्म होने के बाद ये कला धीरे-धीरे सिमटती गई। आज जब टीवी, मोबाइल और सिनेमा ने मनोरंजन पर कब्जा कर लिया है, तब भंड़ैती जैसी जीवंत लोककलाएं इतिहास बनती जा रही हैं। अब भांड़ या तो कीर्तन मंडलियों में चले गए या कोई और धंधा अपनाने लगे। कभी-कभी सालों बाद कोई प्रदर्शन होता है तो लोग अभी भी जुट जाते हैं। इसमें एक बड़ा दोष समाज का भी माना जाना चाहिए क्योंकि भांड़ों को समाज में नीची दृष्टि से भी देखा जाता था। इसलिए संभव है कि उनकी अगली पीढ़ी ने इस कला को नहीं अपनाया। आज भी बुंदेलखंड में कोई अगर तेज़ आवाज़ में बोले तो नकारात्मक संदर्भ में लोग कह देते हैं’काए भांड़ जैसे चिल्ला रहे?’। बहरहाल बुन्देलखंड की ये पुरानी परंपरा हमें याद दिलाती है कि कभी हास्य और व्यंग्य के जरिए भी समाज की कमजोरियाँ उजागर की जाती थीं। इसे बचाने की कोशिश नहीं हुई तो इसका जिक्र सिर्फ किताबों में ही रह जाएगा।

