भारत में हर कर्मचारी को समय पर वेतन मिलना उसका कानूनी और मौलिक अधिकार है. लेकिन कई बार कंपनियां या बॉस सैलरी देने में देरी करते हैं. ऐसे में ज्यादातर कर्मचारी यह नहीं जानते कि कानून उनके पक्ष में क्या कहता है. भारतीय संविधान और श्रम कानूनों के तहत हर नियोक्ता (Employer) की जिम्मेदारी है कि वह अपने कर्मचारियों को तय समय पर वेतन दे. इस विषय में “Payment of Wages Act, 1936” और “Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946” जैसे कानून लागू होते हैं.
वेतन देने की समय सीमा कानून के अनुसार
जिन संस्थानों में 1000 से कम कर्मचारी हैं, वहां हर महीने की 7 तारीख तक सैलरी दी जानी चाहिए. जिनमें 1000 से अधिक कर्मचारी हैं, वहां अधिकतम 10 तारीख तक वेतन देना अनिवार्य है. अगर कोई नियोक्ता इस समय सीमा से अधिक देर करता है, तो यह कानूनी उल्लंघन माना जाता है.
“Payment of Wages Act, 1936” के तहत सजा का प्रावधान
इस कानून के धारा 20 और 21 में कहा गया है कि अगर कोई नियोक्ता कर्मचारी को समय पर वेतन नहीं देता, तो यह कानून का उल्लंघन (Offence) माना जाएगा. पहली बार गलती करने पर जुर्माना ₹1,500 से ₹7,500 तक लगाया जा सकता है. अगर बार-बार ऐसा होता है या जानबूझकर सैलरी रोकी जाती है, तो 6 महीने तक की कैद या 10,000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों सजा एक साथ दी जा सकती हैं. कुछ मामलों में मुआवजा (Compensation) भी दिया जा सकता है
सबूत रखना जरूरी
कर्मचारी को हमेशा ऑफर लेटर, बैंक ट्रांजेक्शन, ईमेल या चैट रिकॉर्ड संभालकर रखना चाहिए. ये सभी सबूत शिकायत के दौरान उपयोगी साबित होते हैं.
निजी कंपनी और अनुबंध कर्मी
निजी संस्थानों या कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों पर भी यही कानून लागू होता है. यदि अनुबंध में तय तिथि पर भुगतान नहीं किया गया, तो कर्मचारी कानूनी कार्रवाई कर सकता है.

