चम्बल घड़ियाल अभयारण्य
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य को राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य के नाम से भी जाना जाता है, जो पर्यटकों के बीच चंबल बोट सफारी के नाम से भी प्रसिद्ध है. यह मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के संयुक्त प्रयासों से शुरू हुई एक प्रमुख घड़ियाल संरक्षण परियोजना है. इसकी शुरुवात साल 1978 में मध्यप्रदेश ने की थी, जिसे बाद में राजस्थान और उत्तर प्रदेश ने भी वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत संरक्षित किया. 5400 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ यह अभ्यारण्य स्थलाकृति खड्डों, पहाड़ियों और रेतीले समुद्र तटों से भरा कथिअर-गिर शुष्क पर्णपाती वन पारिस्थितिकी क्षेत्र का हिस्सा है. चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य का मुख्य उद्देश्य लुप्तप्राय घड़ियाल, लाल मुकुट वाले कछुए और गंगा डॉल्फिन को संरक्षित करना है. इसके अलावा यहां मगरमच्छ, चिकने बालों वाले ऊदबिलाव, धारीदार लकड़बग्घा और भारतीय भेड़ियों को भी संरक्षित किया गया है. इस अभयारण्य में कछुवों की 26 दुर्लभ प्रजातियों में से 8 प्रजातियाँ पाई जाती हैं. साथ ही यह अभयारण्य गंगा डॉल्फ़िन के अंतिम मौजूदा घरों में से एक है और यहां एक हज़ार से ज़्यादा घड़ियाल और 300 से ज़्यादा दलदली मगरमच्छ भी रहते हैं. इन सब के अलावा यहां सांभर हिरण, नील गाय, भारतीय हिरन, रीसस बंदर, हनुमान लंगूर, भारतीय ग्रे और छोटे एशियाई नेवले, बंगाल लोमड़ी, पाम सिवेट, जंगली बिल्ली, जंगली सूअर, उत्तरी पाम गिलहरी, भारतीय कलगीदार साही, भारतीय खरगोश, भारतीय उड़ने वाली लोमड़ी और भारतीय लंबे कान वाले हाथी जैसे स्तनधारी जानवर भी पाए जाते हैं. राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य प्रवासी और स्थानीय पक्षियों सहित लगभग 320 प्रजातियों का निवास स्थान हैं, जिसमें सारस क्रेन, पल्लास फिश ईगल, इंडियन कोर्सर पल्लीड हैरियर, लेसर फ्लेमिंगो, ब्लैक-बेलिड टर्न, रेड-क्रेस्टेड पोचार्ड, फेरुगिनस पोचार्ड, बार हेडेड गूज, ग्रेट थिक नी, ग्रेटर फ्लेमिंगो, डार्टर और ब्राउन हॉक उल्लू आदि शामिल हैं.
भैंसरोड़गढ़ अभयारण्य
229 वर्ग किलोमीटर में फैला ये अभयारण्य राजस्थान के चित्तौडग़ढ़ जिले में स्थित है, जिसे राजस्थान सरकार ने 5 फरवरी 1983 को वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया था. इस जगह का मुख्य आकर्षण साल 1741 में रावत लाल सिंह द्वारा निर्मित रावतभाटा के पास स्थित विशाल भैंसरोड़गढ़ दुर्ग है, और इसी दुर्ग के नाम पर इस अभयारण्य का नामकरण भी किया गया है. ब्राह्मिनी एवं चम्बल नदियों के संगम पर बना ये जल दुर्ग राजस्थान के रियासतकाल में महाराणा प्रताप के भाई शक्ति सिंह की सैन्य चौकी हुआ करता था. यह अभयारण्य बाघ, तेंदुए, सुस्त भालू, लकड़बग्घा और हिरणों की कई प्रजातियों सहित वन्यजीवों की एक विविध श्रेणी का घर है. इसके साथ ही यहां की वन्सपति की बात करें तो धोक यहाँ का मुख्य वृक्ष है, जबकि यहाँ सालार, कदम्ब, गुर्जन, पलाश, तेन्दु, सिरस, आमला, खैर, बेर सेमल आदि पेड़ों के साथ नम जगहों पर अमलतास, इमली, आम, जामुन, चुरेल, अर्जुन, बहेड़ा, कलम और बरगद प्रजाति के पेड़ भी मिलते हैं.
मुकुंदरा हिल्स अभयारण्य
बूंदी, कोटा, झालावाड़ और चित्तौड़गढ़ में फैले मुकुंदरा टाइगर रिजर्व को दर्रा वन्यजीव अभयारण्य और मुकुंदरा टाइगर रिजर्व के नाम से भी जाना जाता है. इस की स्थापना साल 2004 में दर्रा वन्यजीव अभयारण्य, राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य और जवाहर सागर वन्यजीव अभयारण्य को मिलाकर की गई थी. कोटा से सिर्फ 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह अभयारण्य रणथंभौर और सरिस्का टाइगर रिजर्व के बाद राजस्थान का तीसरा सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व है. यह टाइगर रिजर्व चारों ओर से घने जंगलों से घिरा हुआ है, जिसमें कई औषधीय वनस्पति पाई जाती है. यह रिजर्व में बाघ, तेंदुए, जंगली सूअर, लकड़बग्घा, सुस्त भालू, हिरण, भेड़िये, चिंकारा और मृग के अलावा कई पक्षी प्रजातियों का भी घर है. चम्बल नदी के किनारों पर अभ्यारणों, वनस्पति और जीव-जंतुओं के साथ चम्बल का मध्य प्रदेश और राजस्थान में पर्यटन की दृस्टि से भी काफी महत्वपूर्ण स्थान है. चम्बल के किनारों पर कई पर्यटक और दर्शनीय स्थल है.
चम्बल की शान अभयारण्य और उनमें बसे लकड़बग्घे, पार्ट 3 में समझिये पूरी थ्योरी
