चंबल के किनारे बसा वह मंदिर जहां डकैतों के पहुँचते ही खुल जाती थी बेड़ियां, पार्ट 6

केशव राय मंदिर

राजस्थान के बूंदी ज़िले के केशवरायपाटन में चंबल नदी के किनारे बने इस मंदिर में भगवान विष्णु राजा रन्ति देव की भक्ति से प्रसन्न हो कर दो मूर्तियों के रूप में प्रकट हुए थे. ये मूर्तियां सवयंभु है, जिसमे से एक सफेद पत्थर की मूर्ति में श्री केशवजी और दूसरी काले पत्थर की मूर्ति में श्री चारभुजा नाथ की है. मान्यता के अनुसार चंबल नदी भगवान केशव राय के चरणों को छूने के बाद यू-टर्न कर लेती है. इसके साथ ही मंदिर में भगवान शिव की एक और मूर्ति जम्बू मार्गेश्वर भी स्थापित है जो उसी परिसर के दूसरे मंदिर में स्थित है. ऐसा माना जाता है कि इसकी स्थापना ऋषि परशुराम ने की थी जिन्होंने चंबल नदी के तट पर तपस्या की थी. इसके साथ एक किवदंती ये भी है की एक युद्ध में लड़ने के बाद भगवान परसुराम ने इसी जगह पर अपना खड़क धोया था, जिसके चलते भी चम्बल को श्रापित माना जाने लगा था.

भारेश्वर महादेव मंदिर

उत्तर प्रदेश के इटावा ज़िले में चंबल-यमुना नदी के संगम पर बना यह प्राचीन मंदिर महाभारतकाल का बताया जाता है. इसे लेकर मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने कुछ समय गुजारा था, और इसी दौरान भीम ने भगवान शिव की अराधना करने के लिए चंबल नदी की रेत से शिवलिंग बनाकर स्थापित किया था. ये मंदिर 444 फीट की ऊंचाई पर बना हुआ है, जहां तक जाने के लिए भक्तों को 108 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं.

बटेश्वर मंदिर

धौलपुर से 40 किलोमीटर और मुरैना से 25 किलोमीटर दूर बने इस मंदिर परिसर में करीब 200 प्राचीन मंदिर हैं. बलुआ पत्थर से बने ये मंदिर 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच के हैं, जिनका निर्माण गुर्जर-प्रतिहार शैली में करवाया गया है.

ब्रिक टेंपल

अटेर क्षेत्र के खेराहट गांव के बीहड़ में मौजूद ब्रिक टेंपल के बारे में मान्यता है कि भगवान राम ने त्रेता युग में अपने वनवास के दौरान यहां बहुत समय बिताया था. ब्रिक टेंपल के गर्भ गृह में कोई प्रतिमा स्थापित तो नहीं है लेकिन इसे मां महिषासुर मर्दनी को समर्पित माना जाता है.

गोदावरी धाम

चम्बल गार्डन से रावतभाटा की ओर प्रमुख मार्ग पर यह मंदिर चम्बल नदी के तट पर निर्मित है. कोटा में चंबल के पूर्वी किनारे पर स्थित इस शानदार मंदिर का निर्माण सन 1043 वर्ष के करीब किया गया था. यहां मुख्य रूप से भगवान हनुमान जी की पूजा अर्चना की जाती है, जो काली शिला पर वीर आसन में स्थापित है. हनुमान जी के अलावा यहां सिद्ध विनायक गणेश जी, बटुक भैरव और तुलसी दास जी के मशहूर मंदिर भी हैं.

गरडिया महादेव

कोटा शहर से 25 किलोमीटर कि दूरी पर कोटा-उदयपुर हाईवे के मध्य स्थित गरडिया महादेव मंदिर भगवान शिव का समर्पित एक लोकप्रिय शिव मंदिर हैं. चंबल नदी के तट पर स्थित होने के कारण गरडिया महादेव को पिकनिक स्थल के रूप में भी जाना जाता है.

गेपरनाथ मंदिर

कोटा से रावतभाटा मार्ग पर 22 किमी की दूरी पर गेपरनाथ मंदिर चम्बल नदी के समीप चम्बल घाटी की दुर्गम पहाड़ियों में बसा हुआ है. इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यह भगवान शिव को समर्पित यह एक ऐसा मंदिर है, जहां पर स्वयं प्रकृति ही भगवान शिव का अभिषेक करती है. इस मंदिर की स्थापना भीलों के गुरु शैव मतावलंबी ने करवाई थी. चम्बल नदी की कराइयों में विराजमान शिव के दर्शन करने के लिए करीब 350 सीढ़िया उतरकर नीचे गर्भगृह में जाना होता है.

शिपावरा संगम

मध्य प्रदेश के रतलाम, मंदसौर, और राजस्थान के झालावाड़ ज़िलों की सीमा पर स्थित शिपावरा महादेव मंदिर जिसे शिपावरा संगम के नाम से भी जाना जाता है, शिप्रा और चंबल नदियों के संगम पर स्थित है. मान्यता है कि भगवान शिव भस्मासुर से बचने के लिए इसी जगह छिपे थे, इसलिए इसका नाम छिपावरा पड़ा, जिसे आगे चलकर शिपावरा बुलाया जाने लगा.

जोगणिया माता मंदिर

भीलवाड़ा और चित्तौड़गढ़ के मध्य सीमा पर स्थित यह ऐतिहासिक और चमत्कारी मंदिर अपनी अनोखी मान्यताओं के लिए विश्वभर में मशहूर है. मंदिर के बारे में मान्यता है कि चोर और डाकू वारदात को अंजाम देने से पहले माता का आशीर्वाद लिया करते थे. और पुलिस के हत्थे चढ़ने के बाद मौके से फरार होते हुए मां के दरबार पहुंचते था जहां उनके हाथों में लगी बेड़िया अपने आप ही खुल जाया करती थी. मंदिर के पुजारी के अनुसार इस प्राचीन प्रमुख शक्ति पीठ जोगणिया माता मंदिर परिसर में चारों और अनेकों देवीयो की प्रतिमा की स्थापना की गई हैं. जिसमे 64 जोगणिया देवियों के स्वरूप के रूप में प्रतिमा स्थापित की गई है.

उत्तर भारत की सबसे प्राचीन नदियों में से एक चम्बल की शुरुवात और अंत दोनों ही धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व वाली नदियों के साथ होता है, लेकिन इसके बाद भी चंबल को बुंदेलखंड क्षेत्र के अलावा सभी जगहों पर श्रापित माना जाता है. प्राचीनकाल में ‘चर्मवती’ के नाम से जाने जाने वाली चम्बल नदी को श्रापित मानने के पीछे अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग कविंदंतियाँ और धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं.

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